मधु गीति संख्या ४४०, रचना दिवस जुलाई २४, 2009
आबरू है तो सिर्फ़ तेरी है, ना ही मेरी है, ना किसी की है;
जिसकी भी है, ढकी तूने है, रखी जैसे भी , रखी तूने है।
क्रोध की अग्नि तुम जला देते, आदमी से हो कुछ करा देते;
पलों में उसको तुम लजा देते, सजा जग से भी तुम दिला देते।
Sunday, August 23, 2009
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