Sunday, August 23, 2009

MG 440 Abaroo hai to sirf terii hai

मधु गीति संख्या ४४०, रचना दिवस जुलाई २४, 2009

आबरू है तो सिर्फ़ तेरी है, ना ही मेरी है, ना किसी की है;
जिसकी भी है, ढकी तूने है, रखी जैसे भी , रखी तूने है।

क्रोध की अग्नि तुम जला देते, आदमी से हो कुछ करा देते;
पलों में उसको तुम लजा देते, सजा जग से भी तुम दिला देते।